Thursday, 13 February 2020


तुम मुस्कुराते हो

लगता है वसंत ऋतु हो
तुम्हारे एहसास को
मैं कुछ इस कदर महसूसती हूँ
लगता है सर्द मौसम में सरसराती हवाये हो




तुम खिलखिलाते हो
लगता है धूप सुनहरी हो
तुम्हारे ख्वाब को
मैं कुछ इस कदर बुनती हूँ
लगता है तपती रेत में प्यार की ठंडक हो



तुम खामोश होते हो
लगता है काले, घनेरे बादल हो
तुम्हारी चुप्पी को
लगता है खेत खलियान में पकी फसलों
मैं कुछ इस कदर देखती हूँ
पर मडराते बादल हो

तुम फासले बनाते हो
लगता है मंजिल दूर है
तुम्हारी नजरअंदाजगी को
मैं कुछ इस कदर बया करती हूँ
लगता है तुम ज़िंदगी, तुम बंदगी,,
तुम ताजगी,,तुम सादगी,, तुम ही तो मेरी मंजिल हो

तुम रू-ब -रू जो हुये
लगा तुम ही तो मेरी नियति हो
तुम्हारी मौजूदगी को
लगता है मेरी कलम ख्वाबों की शक्ल को सामने रख चुकी हो
मैं कुछ इस कदर समझने लगी